गुरु गोविन्द सिंह का इतिहास | Guru Govind singh Ji ka Itihas In Hindi

Guru Govind singh Ji ka Itihas In Hindi गुरु गोविन्द सिंह का इतिहास :- आज के इस लेख मे आपको सिक्ख धर्म के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह के बारे मे जानकारी उपलब्ध करवाई गई है

गुरु गोविन्द सिंह (1675-1708 ई.)

guru govind singh ji
  • इनका जन्म पटना (बिहार) में हुआ। ये सिक्खों के दसवें व अंतिम गुरु थे। अपनी मृत्यु से पूर्व इन्होंने गुरु की गद्दी को समाप्त कर दिया। पंजाब में मखोवल या आनन्दपुर में अपना मुख्यालय बनाया। 1699 ई. में खालसा (दी सोसायटी ऑफ दी प्योर) की स्थापना की, सिक्खों को पंचमकार (केश, कंघा, कड़ा, कच्छा ओर कृपाण) धारण करने का आदेश दिया सिक्खों को कट्टर सैनिक संप्रदाय बनाने में सफलता प्राप्त की। ये युद्धकला एवं आध्यात्मिक नेतृत्व दोनों में निपुण थे।
  • गोविन्द सिंह के (Guru Govind singh Ji ka Itihas In Hindi) शिष्य मनीसिंह ने सिंहन दी भगतमाला लिखी। इन्होंने औरंगजेब के विरूद्ध 1700 ई. में आनन्दपुर का प्रथम युद्ध, मई 1704 में आनन्दपुर का द्वितीय युद्ध, 6 दिसम्बर, 1705 को चमकोर का युद्ध, 29 दिसम्बर, 1705 को खिदराना (मुक्तसर) का युद्ध लड़ा।
  • औरंगजेब के सरहिन्द के फौजदार वजीर खां ने इनके पुत्र फतहसिंह एवं जोरावरसिंह को दीवार में जिन्दा चिनवा दिया।
  • औरंगजेब की मृत्यु के बाद बहादुर शाह ने गुरु से उत्तराधिकार युद्ध में सहायता मांगी। इससे पहले बहादुरशाह (मुअज्जम) ने काबुल का गवर्नर रहते हुए सिक्खों के साथ समझौता कर उन्हें पनाह दी थी।
  • बहादुरशाह प्रथम ने गोविन्द सिंह को 5000 का मनसब दिया।

baba guru govind singh notes pdf

  • गुरु गोविन्द सिंह ने 1688-90 ई. के बीच चार किले बनवायें
    1. आनन्द गढ़
    2. केशगढ़
    3. लौहागढ़
    4. फतेहगढ़।
  • लौहागढ़ का किला गुरु गोविन्द सिंह ने ही मुखलिसगढ़ के किले के नाम से बनवाया था। बन्दा बहादुर ने मुखलिसगढ़ के किले की मरम्मत करके इसका नाम लौहागढ़ रखा।
  • गोदावरी नदी के तट पर नान्देड़ नामक स्थान पर एक पठान जमशेद खान ने 1708 ई. में उन्हें छुरा मारकर घायल कर दिया। कुछ समय पश्चात उन्होंने मृत्यु निश्चित जानकर आत्मदाह कर लिया।
  • गुरुगोविन्द सिंह की याद में नांदेड़ (महाराष्ट्र) में हुजूर साहब गुरुद्वारे का निर्माण हुआ।
  • गुरु गोविन्दसिंह ने एक पूरक ग्रन्थ ‘ दसवें बादशाह का ग्रन्थ’ का संकलन किया। विचित्र नाटक उनकी आत्मकथा है।

Guru Govind singh Biography

  • गुरु गोविन्द सिंह ने औरंगजेब को 1704 ई. में ‘ जफरनामा‘ नामक फारसी भाषा में पत्रों का संग्रह भेजा।
  • गुरु गोविन्द सिंह द्वारा रचित अन्य पुस्तकें
    1. जपजी साहिब
    2. चंडी चरित्र
    3. उकट विलास
    4. कृष्ण अवतार
    5. शास्त्र नाम माला पुराण
    6. चंडी दा वार
    7. अकाल उस्तात
    8. रामअवतार
    9. पखयान चरित्र
  • गुरु गोविन्द सिंह ने चरणपाहुल के स्थान पर खांडे का पाहुल प्रथा आरम्भ की।
  • पाहुल प्रथा में सिक्ख जाति बन्धन को कमजोर करने के लिए एक कटोरे अमृतपान करते थे।
  • पंच प्यारे:-गुरु गोविन्द सिंह के पांच प्रिय शिष्य दया सिंह, धर्मसिंह, मोखमसिंह, साहिबसिंह व हिम्मत सिंह थे। गुरु ने इनके नाम के आगे सिंह लगाया व अपने अनुयायियों को भी नाम के अन्त में सिंह लगाने को कहा।
  • गुरु गोविन्दसिंह को ‘ सच्चा पादशाह’, उच्छ का पीर एवं सर्वासदानी भी कहा गया है।
  • गुरु गोविन्द सिंह ने मृत्यु से पूर्व गुरु की गद्दी को समाप्त कर आदिग्रन्थ की शिक्षाओं को ही गुरु मानने का आदेश दिया।
  • दूसरा कार्य गुरबक्श सिंह नामक बैरागी, जो बन्दा बहादुर के नाम से प्रसिद्ध थे, को अपने अनुयायियों के साथ राजनैतिक नेतृत्व प्रदान करने के लिए पंजाब भेजना था। बंदा बहादुर ने सिक्खों के धार्मिक उत्पीड़न के विरोध में विद्राह किया।

Guru Govind singh ji ka lekh in hindi

  • बन्दा बहादुर की सबसे महत्त्वपूर्ण विजय 1710 ई. में सरहिन्द की विजय थी। बन्दा ने इस युद्ध में सरहिन्द के मुगल गवर्नर वजीर खाँ को मार डाला।
  • बन्दा बहादुर पहले सिक्ख राजनैतिक नेता थे, जिन्होंने प्रथम स्वतंत्र सिक्ख राज्य की स्थापना की। इसकी राजधानी सरहिन्द थी।
  • बन्दा बहादुर ने ने 1710 ई. में गुरुगोविन्द सिंह व गुरुनानक के नाम के सिक्के जारी किये।
  • सरहिन्द विजय के बाद बन्दा बहादुर ने पादशाह की उपाधि धारण की और एक नया कलैण्डर जारी किया।
  • बन्दा बहादुर ने पंजाब में जमींदारी प्रथा को समाप्त किया।
  • बन्दा बहादुर को 1715 ई. में फर्रूखसियर ने गुरदासपुर के किले में घेर लिया व दिल्ली लाकर हाथी के पैर के नीचे कुचलवा दिया।
  • गुरु गोविन्द सिंह ने पीर बुन्दुशाह व काले खाँ के नेतृत्व में 500 पठानों को भी अपनी सेना में नियुक्त किया।
  • हरिश्चन्द्र वर्मा के अनुसार बन्दा बहादुर का बचपन का नाम लक्ष्मण देव था तथा जब वे बैरागी बने तो उन्होंने माधोदास का नाम धारण किया। लक्ष्मणदेव का जन्म 1670 ई. में पूंछ जिले के राजौरी नामक स्थान पर हुआ तथा नांदेड़ (महाराष्ट्र) में उनकी गुरु गोविन्द सिंह से मुलाकात हुई। गुरुजी ने उन्हें बन्दाबहादुर का नाम दिया। वर्मा के अनुसार बन्दा बहादुर द्वारा स्थापित स्वतंत्र सिक्ख राज्य की राजधानी हिमालय की श्रेणियों में स्थित मुखलिसगढ़ का किला था जिसका नाम बाद में लौहगढ़ रखा गया।

Read Now :- अमृतसर का इतिहास

1 thought on “गुरु गोविन्द सिंह का इतिहास | Guru Govind singh Ji ka Itihas In Hindi”

Leave a comment